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	<title>IndianDemocracy &#8211; Trends Topic</title>
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	<title>IndianDemocracy &#8211; Trends Topic</title>
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	<item>
		<title>12 states में आज से शुरू हुआ Voter List का Special Intensive Revision (SIR), 7 February 2026 तक चलेगी process</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 28 Oct 2025 07:00:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिल्ली]]></category>
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		<category><![CDATA[WestBengal]]></category>
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					<description><![CDATA[उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में आज यानी <strong>28 </strong><strong>अक्टूबर </strong><strong>2025 </strong><strong>से </strong><strong>“Special Intensive Revision” (SIR)</strong> की प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह बड़ा कदम <strong>मतदाता सूची (</strong><strong>Voter List)</strong> को सही, साफ़ और पारदर्शी बनाने के लिए उठाया गया है। यह प्रक्रिया <strong>7 </strong><strong>फरवरी </strong><strong>2026 </strong><strong>तक चलेगी।</strong>

<strong>क्या है </strong><strong>SIR?</strong>

SIR यानी <strong>मतदाता सूची का विशेष सघन पुनरीक्षण</strong>।
इसका मतलब है — हर राज्य में घर-घर जाकर यह जांच की जाएगी कि मतदाता सूची में दर्ज नाम सही हैं या नहीं।
अगर किसी का नाम गलत जुड़ गया है, कोई व्यक्ति अब उस पते पर नहीं रहता, या कोई मतदाता अब नहीं रहा, तो उस जानकारी को अपडेट किया जाएगा।
साथ ही, <strong>नए और पात्र मतदाताओं के नाम</strong> जोड़े जाएंगे।

इस प्रक्रिया का उद्देश्य है —
मतदाता सूची को पूरी तरह <strong>शुद्ध (</strong><strong>clean)</strong> बनाना
<strong>डुप्लीकेट या गलत नामों</strong> को हटाना
और <strong>हर नागरिक को सही वोटिंग अधिकार</strong> देना।

<strong>किन राज्यों में शुरू हुआ है </strong><strong>SIR?</strong>

इस बार कुल <strong>12 </strong><strong>राज्य और केंद्र शासित प्रदेश</strong> इस प्रक्रिया में शामिल हैं:
<ol>
 	<li>उत्तर प्रदेश</li>
 	<li>पश्चिम बंगाल</li>
 	<li>मध्य प्रदेश</li>
 	<li>छत्तीसगढ़</li>
 	<li>तमिलनाडु</li>
 	<li>राजस्थान</li>
 	<li>केरल</li>
 	<li>गुजरात</li>
 	<li>गोवा</li>
 	<li>पुडुचेरी</li>
 	<li>लक्षद्वीप</li>
 	<li>अंडमान और निकोबार</li>
</ol>
असम को फिलहाल इस सूची में शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि वहां सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नागरिकता की जांच (NRC process) चल रही है।

<strong>इन </strong><strong>12 </strong><strong>राज्यों में करीब </strong><strong>51 </strong><strong>करोड़ मतदाता</strong>

चुनाव आयोग के मुताबिक, इन 12 राज्यों में कुल करीब <strong>51 </strong><strong>करोड़ वोटर्स</strong> हैं।
<ul>
 	<li><strong>उत्तर प्रदेश</strong> – 15.44 करोड़</li>
 	<li><strong>पश्चिम बंगाल</strong> – 7.66 करोड़</li>
 	<li><strong>तमिलनाडु</strong> – 6.41 करोड़</li>
 	<li><strong>मध्य प्रदेश</strong> – 5.74 करोड़</li>
 	<li><strong>राजस्थान</strong> – 5.48 करोड़</li>
 	<li><strong>छत्तीसगढ़</strong> – 2.12 करोड़</li>
</ul>
<strong>मुख्य चुनाव आयुक्त का ऐलान</strong>

<strong>मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार</strong> ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर SIR की शुरुआत की घोषणा की।
उनके साथ <strong>चुनाव आयुक्त डॉ. एस.एस. संधू</strong> और <strong>डॉ. विवेक जोशी</strong> भी मौजूद रहे।

उन्होंने बताया कि <strong>बिहार में सफलतापूर्वक कराए गए </strong><strong>SIR</strong> से मिले अनुभवों के आधार पर इस बार की प्रक्रिया को और आसान बनाया गया है।
कुछ <strong>फॉर्म और दस्तावेजों की जांच के तरीके</strong> में बदलाव किया गया है ताकि मतदाताओं को कम परेशानी हो।

अब हर मतदाता को एक <strong>यूनिक फॉर्म</strong> मिलेगा जिसमें उसका पुराना पता और फोटो पहले से छपा होगा।
अगर व्यक्ति अब वहां नहीं रह रहा है, तो वह फॉर्म में बदलाव कर सकता है।
आयोग ने मतदाताओं से आग्रह किया है कि वे <strong>रंगीन फोटो</strong> लगाएं ताकि पहचान पत्र (Voter ID) और साफ़ दिखे।

<strong>अभी वोटर लिस्ट में कोई बदलाव नहीं होगा</strong>

जिन 12 राज्यों में SIR चल रहा है, वहां फिलहाल मतदाता सूची में
❌ कोई नया नाम नहीं जोड़ा जाएगा और
❌ कोई नाम नहीं हटाया जाएगा।

सारी एंट्री और बदलाव अब SIR की प्रक्रिया के दौरान ही किए जाएंगे।

<strong>SIR </strong><strong>की पूरी टाइमलाइन</strong>
<table>
<thead>
<tr>
<td><strong>चरण</strong></td>
<td><strong>समयावधि</strong></td>
</tr>
</thead>
<tbody>
<tr>
<td>गणना पत्रों की छपाई और BLO (Booth Level Officer) को प्रशिक्षण</td>
<td>28 अक्टूबर – 3 नवंबर 2025</td>
</tr>
<tr>
<td>घर-घर जाकर सत्यापन (Door to door verification)</td>
<td>4 नवंबर – 4 दिसंबर 2025</td>
</tr>
<tr>
<td>मतदाता सूची का मसौदा जारी</td>
<td>9 दिसंबर 2025</td>
</tr>
<tr>
<td>दावे और आपत्तियां दर्ज करने की तारीख</td>
<td>9 दिसंबर 2025 – 8 जनवरी 2026</td>
</tr>
<tr>
<td>दस्तावेज़ जांच, सुनवाई और सत्यापन</td>
<td>9 दिसंबर 2025 – 31 जनवरी 2026</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>अंतिम मतदाता सूची जारी</strong></td>
<td><strong>7 </strong><strong>फरवरी </strong><strong>2026</strong></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<strong>क्यों जरूरी है </strong><strong>SIR?</strong>

चुनाव आयोग के अनुसार SIR शुरू करने की कई बड़ी वजहें हैं:
<ol>
 	<li><strong>तेजी से शहरीकरण (</strong><strong>Urbanization)</strong> — लोग शहरों में जाकर बस रहे हैं, जिससे पुराने पते पर नाम रह जाते हैं।</li>
 	<li><strong>डुप्लीकेट नाम</strong> — कई लोगों के नाम दो जगह दर्ज हो जाते हैं।</li>
 	<li><strong>मृत मतदाताओं के नाम</strong> – कई बार मर चुके लोगों के नाम अभी भी सूची में रहते हैं।</li>
 	<li><strong>गलत तरीके से घुसपैठ कर नाम जुड़वाना</strong> – कुछ लोग गैरकानूनी तरीके से अपने नाम वोटर लिस्ट में जोड़ लेते हैं।</li>
</ol>
इन सभी गड़बड़ियों को ठीक करने के लिए SIR बहुत जरूरी माना गया है।

<strong>राजनीतिक प्रतिक्रिया और आयोग का रुख</strong>

पश्चिम बंगाल में कुछ राजनीतिक दलों ने SIR पर सवाल उठाए हैं,
जिस पर मुख्य चुनाव आयुक्त ने साफ कहा कि —

“SIR एक <strong>संवैधानिक प्रक्रिया (</strong><strong>Constitutional Process)</strong> है, और राज्य सरकारें इसमें सहयोग करने के लिए बाध्य हैं।”

उन्होंने बताया कि अब तक किसी भी राज्य से <strong>असहयोग की कोई रिपोर्ट नहीं</strong> आई है।
बिहार में जब SIR हुआ था, तब भी सभी राजनीतिक दलों और उनके <strong>बूथ लेवल एजेंट्स</strong> ने पूरा सहयोग दिया था।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका <strong>किसी राजनीतिक दल से कोई मनमुटाव नहीं</strong> है, और न ही वह किसी के खिलाफ कोई टिप्पणी करता है।

<strong>इतिहास (</strong><strong>Past Record)</strong>

भारत में यह प्रक्रिया कोई नई नहीं है।
1951 से 2004 तक <strong>8 </strong><strong>बार </strong><strong>SIR</strong> कराया जा चुका है।
<strong>आखिरी बार </strong><strong>2002-2004</strong> के बीच यह देशभर में हुआ था।
लगभग <strong>21 </strong><strong>साल बाद</strong>, अब यह <strong>नौवां </strong><strong>SIR</strong> शुरू हुआ है।

देश के 12 राज्यों में शुरू हुई यह SIR प्रक्रिया आने वाले चुनावों के लिए बेहद अहम मानी जा रही है।
इसके जरिए चुनाव आयोग का लक्ष्य है कि देश की मतदाता सूची पूरी तरह <strong>सटीक</strong><strong>, </strong><strong>साफ़ और अपडेटेड</strong> हो — ताकि हर नागरिक को उसका <strong>सही मतदान अधिकार (</strong><strong>Right to Vote)</strong> मिल सके और चुनावों की प्रक्रिया और भी <strong>पारदर्शी (</strong><strong>Transparent)</strong> बन सके।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में आज यानी <strong>28 </strong><strong>अक्टूबर </strong><strong>2025 </strong><strong>से </strong><strong>“Special Intensive Revision” (SIR)</strong> की प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह बड़ा कदम <strong>मतदाता सूची (</strong><strong>Voter List)</strong> को सही, साफ़ और पारदर्शी बनाने के लिए उठाया गया है। यह प्रक्रिया <strong>7 </strong><strong>फरवरी </strong><strong>2026 </strong><strong>तक चलेगी।</strong>

<strong>क्या है </strong><strong>SIR?</strong>

SIR यानी <strong>मतदाता सूची का विशेष सघन पुनरीक्षण</strong>।
इसका मतलब है — हर राज्य में घर-घर जाकर यह जांच की जाएगी कि मतदाता सूची में दर्ज नाम सही हैं या नहीं।
अगर किसी का नाम गलत जुड़ गया है, कोई व्यक्ति अब उस पते पर नहीं रहता, या कोई मतदाता अब नहीं रहा, तो उस जानकारी को अपडेट किया जाएगा।
साथ ही, <strong>नए और पात्र मतदाताओं के नाम</strong> जोड़े जाएंगे।

इस प्रक्रिया का उद्देश्य है —
मतदाता सूची को पूरी तरह <strong>शुद्ध (</strong><strong>clean)</strong> बनाना
<strong>डुप्लीकेट या गलत नामों</strong> को हटाना
और <strong>हर नागरिक को सही वोटिंग अधिकार</strong> देना।

<strong>किन राज्यों में शुरू हुआ है </strong><strong>SIR?</strong>

इस बार कुल <strong>12 </strong><strong>राज्य और केंद्र शासित प्रदेश</strong> इस प्रक्रिया में शामिल हैं:
<ol>
 	<li>उत्तर प्रदेश</li>
 	<li>पश्चिम बंगाल</li>
 	<li>मध्य प्रदेश</li>
 	<li>छत्तीसगढ़</li>
 	<li>तमिलनाडु</li>
 	<li>राजस्थान</li>
 	<li>केरल</li>
 	<li>गुजरात</li>
 	<li>गोवा</li>
 	<li>पुडुचेरी</li>
 	<li>लक्षद्वीप</li>
 	<li>अंडमान और निकोबार</li>
</ol>
असम को फिलहाल इस सूची में शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि वहां सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नागरिकता की जांच (NRC process) चल रही है।

<strong>इन </strong><strong>12 </strong><strong>राज्यों में करीब </strong><strong>51 </strong><strong>करोड़ मतदाता</strong>

चुनाव आयोग के मुताबिक, इन 12 राज्यों में कुल करीब <strong>51 </strong><strong>करोड़ वोटर्स</strong> हैं।
<ul>
 	<li><strong>उत्तर प्रदेश</strong> – 15.44 करोड़</li>
 	<li><strong>पश्चिम बंगाल</strong> – 7.66 करोड़</li>
 	<li><strong>तमिलनाडु</strong> – 6.41 करोड़</li>
 	<li><strong>मध्य प्रदेश</strong> – 5.74 करोड़</li>
 	<li><strong>राजस्थान</strong> – 5.48 करोड़</li>
 	<li><strong>छत्तीसगढ़</strong> – 2.12 करोड़</li>
</ul>
<strong>मुख्य चुनाव आयुक्त का ऐलान</strong>

<strong>मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार</strong> ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर SIR की शुरुआत की घोषणा की।
उनके साथ <strong>चुनाव आयुक्त डॉ. एस.एस. संधू</strong> और <strong>डॉ. विवेक जोशी</strong> भी मौजूद रहे।

उन्होंने बताया कि <strong>बिहार में सफलतापूर्वक कराए गए </strong><strong>SIR</strong> से मिले अनुभवों के आधार पर इस बार की प्रक्रिया को और आसान बनाया गया है।
कुछ <strong>फॉर्म और दस्तावेजों की जांच के तरीके</strong> में बदलाव किया गया है ताकि मतदाताओं को कम परेशानी हो।

अब हर मतदाता को एक <strong>यूनिक फॉर्म</strong> मिलेगा जिसमें उसका पुराना पता और फोटो पहले से छपा होगा।
अगर व्यक्ति अब वहां नहीं रह रहा है, तो वह फॉर्म में बदलाव कर सकता है।
आयोग ने मतदाताओं से आग्रह किया है कि वे <strong>रंगीन फोटो</strong> लगाएं ताकि पहचान पत्र (Voter ID) और साफ़ दिखे।

<strong>अभी वोटर लिस्ट में कोई बदलाव नहीं होगा</strong>

जिन 12 राज्यों में SIR चल रहा है, वहां फिलहाल मतदाता सूची में
❌ कोई नया नाम नहीं जोड़ा जाएगा और
❌ कोई नाम नहीं हटाया जाएगा।

सारी एंट्री और बदलाव अब SIR की प्रक्रिया के दौरान ही किए जाएंगे।

<strong>SIR </strong><strong>की पूरी टाइमलाइन</strong>
<table>
<thead>
<tr>
<td><strong>चरण</strong></td>
<td><strong>समयावधि</strong></td>
</tr>
</thead>
<tbody>
<tr>
<td>गणना पत्रों की छपाई और BLO (Booth Level Officer) को प्रशिक्षण</td>
<td>28 अक्टूबर – 3 नवंबर 2025</td>
</tr>
<tr>
<td>घर-घर जाकर सत्यापन (Door to door verification)</td>
<td>4 नवंबर – 4 दिसंबर 2025</td>
</tr>
<tr>
<td>मतदाता सूची का मसौदा जारी</td>
<td>9 दिसंबर 2025</td>
</tr>
<tr>
<td>दावे और आपत्तियां दर्ज करने की तारीख</td>
<td>9 दिसंबर 2025 – 8 जनवरी 2026</td>
</tr>
<tr>
<td>दस्तावेज़ जांच, सुनवाई और सत्यापन</td>
<td>9 दिसंबर 2025 – 31 जनवरी 2026</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>अंतिम मतदाता सूची जारी</strong></td>
<td><strong>7 </strong><strong>फरवरी </strong><strong>2026</strong></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<strong>क्यों जरूरी है </strong><strong>SIR?</strong>

चुनाव आयोग के अनुसार SIR शुरू करने की कई बड़ी वजहें हैं:
<ol>
 	<li><strong>तेजी से शहरीकरण (</strong><strong>Urbanization)</strong> — लोग शहरों में जाकर बस रहे हैं, जिससे पुराने पते पर नाम रह जाते हैं।</li>
 	<li><strong>डुप्लीकेट नाम</strong> — कई लोगों के नाम दो जगह दर्ज हो जाते हैं।</li>
 	<li><strong>मृत मतदाताओं के नाम</strong> – कई बार मर चुके लोगों के नाम अभी भी सूची में रहते हैं।</li>
 	<li><strong>गलत तरीके से घुसपैठ कर नाम जुड़वाना</strong> – कुछ लोग गैरकानूनी तरीके से अपने नाम वोटर लिस्ट में जोड़ लेते हैं।</li>
</ol>
इन सभी गड़बड़ियों को ठीक करने के लिए SIR बहुत जरूरी माना गया है।

<strong>राजनीतिक प्रतिक्रिया और आयोग का रुख</strong>

पश्चिम बंगाल में कुछ राजनीतिक दलों ने SIR पर सवाल उठाए हैं,
जिस पर मुख्य चुनाव आयुक्त ने साफ कहा कि —

“SIR एक <strong>संवैधानिक प्रक्रिया (</strong><strong>Constitutional Process)</strong> है, और राज्य सरकारें इसमें सहयोग करने के लिए बाध्य हैं।”

उन्होंने बताया कि अब तक किसी भी राज्य से <strong>असहयोग की कोई रिपोर्ट नहीं</strong> आई है।
बिहार में जब SIR हुआ था, तब भी सभी राजनीतिक दलों और उनके <strong>बूथ लेवल एजेंट्स</strong> ने पूरा सहयोग दिया था।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका <strong>किसी राजनीतिक दल से कोई मनमुटाव नहीं</strong> है, और न ही वह किसी के खिलाफ कोई टिप्पणी करता है।

<strong>इतिहास (</strong><strong>Past Record)</strong>

भारत में यह प्रक्रिया कोई नई नहीं है।
1951 से 2004 तक <strong>8 </strong><strong>बार </strong><strong>SIR</strong> कराया जा चुका है।
<strong>आखिरी बार </strong><strong>2002-2004</strong> के बीच यह देशभर में हुआ था।
लगभग <strong>21 </strong><strong>साल बाद</strong>, अब यह <strong>नौवां </strong><strong>SIR</strong> शुरू हुआ है।

देश के 12 राज्यों में शुरू हुई यह SIR प्रक्रिया आने वाले चुनावों के लिए बेहद अहम मानी जा रही है।
इसके जरिए चुनाव आयोग का लक्ष्य है कि देश की मतदाता सूची पूरी तरह <strong>सटीक</strong><strong>, </strong><strong>साफ़ और अपडेटेड</strong> हो — ताकि हर नागरिक को उसका <strong>सही मतदान अधिकार (</strong><strong>Right to Vote)</strong> मिल सके और चुनावों की प्रक्रिया और भी <strong>पारदर्शी (</strong><strong>Transparent)</strong> बन सके।]]></content:encoded>
					
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	</item>
		<item>
		<title>Operation Sindoor पर Parliament में होगी 25 घंटे की बड़ी Debate: Government पूरी तैयारी में, Trump के &#8216;Ceasefire&#8217; दावे पर उठे सवाल</title>
		<link>https://trendstopic.in/25-hour-mega-debate-on-operation-sindoor-in-parliament-government-fully-prepared-questions-raised-over-trumps-ceasefire-claim/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 24 Jul 2025 05:35:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[संसद के मानसून सत्र में 29 जुलाई को <strong>'</strong><strong>ऑपरेशन सिंदूर</strong><strong>'</strong> पर बड़ी बहस होने जा रही है, जो राजनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों लिहाज़ से बेहद अहम मानी जा रही है। इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं। सरकार ने <strong>लोकसभा में </strong><strong>16 </strong><strong>घंटे और राज्यसभा में </strong><strong>9 </strong><strong>घंटे</strong> की चर्चा के लिए समय तय किया है, जिसे बाद में <strong>राज्यसभा में भी </strong><strong>16 </strong><strong>घंटे तक</strong> बढ़ा दिया गया।

इस चर्चा में <strong>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी</strong>, <strong>गृह मंत्री अमित शाह</strong> और <strong>रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह</strong> के बोलने की उम्मीद है, जबकि विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की पूरी रणनीति तैयार कर ली है।

<strong>बहस क्यों ज़रूरी हो गई</strong><strong>?</strong>

इस बहस की मांग तब से ज़ोर पकड़ रही है जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति <strong>डोनाल्ड ट्रंप</strong> ने दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच <strong>"</strong><strong>सीजफायर करवाई थी"</strong>, यानी युद्ध रोकवाया था। ट्रंप ये बात अब तक <strong>25 </strong><strong>बार दोहरा चुके हैं</strong>, जिससे भारत की विदेश नीति और संप्रभुता पर सवाल उठ रहे हैं।

<strong>विपक्ष</strong> का कहना है कि अगर ट्रंप की बात सही है, तो क्या भारत ने किसी विदेशी नेता की मदद से युद्ध टालने की अनुमति दी?
<strong>कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे</strong> ने इसे भारत के लिए "शर्मनाक" बताया और कहा कि प्रधानमंत्री को खुद संसद में जवाब देना चाहिए।
<strong>राहुल गांधी</strong> ने कहा – "दाल में कुछ काला है" और इस पर खुलकर बहस होनी चाहिए।

<strong>प्रधानमंत्री का जवाब क्या होगा</strong><strong>?</strong>

सरकार ने संकेत दिए हैं कि प्रधानमंत्री <strong>मोदी खुद संसद में जवाब देंगे</strong> और यह साफ करेंगे कि <strong>कोई भी मध्यस्थता नहीं हुई थी</strong>।
विदेश मंत्रालय पहले ही साफ कर चुका है कि भारत और पाकिस्तान के बीच जो भी सीजफायर हुआ, वह <strong>आपसी समझौते</strong> के तहत हुआ था, न कि ट्रंप की वजह से।

<strong>ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम हमला</strong>

इस बहस में <strong>22 </strong><strong>अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम</strong> में हुए <strong>आतंकी हमले</strong> का मुद्दा भी शामिल किया गया है, जिसमें <strong>26 </strong><strong>हिंदू श्रद्धालुओं की जान गई थी</strong>। विपक्ष पूछ रहा है कि अब तक हमले के जिम्मेदार आतंकियों को पकड़ा क्यों नहीं गया?
सरकार की तरफ से कहा गया है कि ऑपरेशन सिंदूर इसी के जवाब में चलाया गया, लेकिन अब तक इसके पूरे ब्योरे सामने नहीं आए हैं।

<strong>बिहार में </strong><strong>SIR </strong><strong>यानी </strong><strong>Special Intensive Revision</strong>

चर्चा के दौरान बिहार में चल रही <strong>वोटर लिस्ट की स्पेशल रिवीजन (</strong><strong>SIR)</strong> का मुद्दा भी उठेगा। विपक्ष का आरोप है कि इसमें गड़बड़ियां हो रही हैं, जबकि सरकार कह रही है कि यह नियमित प्रक्रिया है।

<strong>अब आगे क्या</strong><strong>?</strong>
<ul>
 	<li>बहस <strong>28 </strong><strong>जुलाई को लोकसभा</strong> में शुरू होगी और <strong>29 </strong><strong>जुलाई को राज्यसभा</strong> में जारी रहेगी।</li>
 	<li>यह बहस संसद के इतिहास की <strong>सबसे लंबी चर्चाओं में से एक</strong> हो सकती है, जिसमें सुरक्षा, विदेश नीति और राजनीति—तीनों पहलुओं पर बात होगी।</li>
 	<li>इसमें इस बात पर भी चर्चा होगी कि क्या <strong>सरकार जनता और संसद को ऑपरेशन सिंदूर के सभी तथ्यों से अवगत करा रही है या नहीं।</strong></li>
</ul>
<strong>लोगों के लिए क्यों ज़रूरी है जानना</strong><strong>?</strong>
<ul>
 	<li>क्योंकि ये बहस सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि <strong>देश की सुरक्षा</strong>, <strong>हमारे पड़ोसी देशों से रिश्ते</strong>, और <strong>भारत की विदेश नीति</strong> की साख से जुड़ी है।</li>
 	<li>अगर किसी विदेशी नेता ने हमारे देश की ओर से बिना जानकारी के कुछ तय किया, तो यह <strong>संप्रभुता पर सीधा हमला</strong> माना जाएगा।</li>
</ul>
<strong>ऑपरेशन सिंदूर</strong> और <strong>ट्रंप के दावे</strong> ने संसद का तापमान बढ़ा दिया है। अब देखना ये है कि इस बहस में सरकार कितनी पारदर्शिता दिखाती है और विपक्ष इसे किस हद तक मुद्दा बनाता है। संसद में होने वाली ये 25 घंटे की बहस न सिर्फ सांसदों के लिए, बल्कि हर आम नागरिक के लिए भी अहम होगी।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[संसद के मानसून सत्र में 29 जुलाई को <strong>'</strong><strong>ऑपरेशन सिंदूर</strong><strong>'</strong> पर बड़ी बहस होने जा रही है, जो राजनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों लिहाज़ से बेहद अहम मानी जा रही है। इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं। सरकार ने <strong>लोकसभा में </strong><strong>16 </strong><strong>घंटे और राज्यसभा में </strong><strong>9 </strong><strong>घंटे</strong> की चर्चा के लिए समय तय किया है, जिसे बाद में <strong>राज्यसभा में भी </strong><strong>16 </strong><strong>घंटे तक</strong> बढ़ा दिया गया।

इस चर्चा में <strong>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी</strong>, <strong>गृह मंत्री अमित शाह</strong> और <strong>रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह</strong> के बोलने की उम्मीद है, जबकि विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की पूरी रणनीति तैयार कर ली है।

<strong>बहस क्यों ज़रूरी हो गई</strong><strong>?</strong>

इस बहस की मांग तब से ज़ोर पकड़ रही है जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति <strong>डोनाल्ड ट्रंप</strong> ने दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच <strong>"</strong><strong>सीजफायर करवाई थी"</strong>, यानी युद्ध रोकवाया था। ट्रंप ये बात अब तक <strong>25 </strong><strong>बार दोहरा चुके हैं</strong>, जिससे भारत की विदेश नीति और संप्रभुता पर सवाल उठ रहे हैं।

<strong>विपक्ष</strong> का कहना है कि अगर ट्रंप की बात सही है, तो क्या भारत ने किसी विदेशी नेता की मदद से युद्ध टालने की अनुमति दी?
<strong>कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे</strong> ने इसे भारत के लिए "शर्मनाक" बताया और कहा कि प्रधानमंत्री को खुद संसद में जवाब देना चाहिए।
<strong>राहुल गांधी</strong> ने कहा – "दाल में कुछ काला है" और इस पर खुलकर बहस होनी चाहिए।

<strong>प्रधानमंत्री का जवाब क्या होगा</strong><strong>?</strong>

सरकार ने संकेत दिए हैं कि प्रधानमंत्री <strong>मोदी खुद संसद में जवाब देंगे</strong> और यह साफ करेंगे कि <strong>कोई भी मध्यस्थता नहीं हुई थी</strong>।
विदेश मंत्रालय पहले ही साफ कर चुका है कि भारत और पाकिस्तान के बीच जो भी सीजफायर हुआ, वह <strong>आपसी समझौते</strong> के तहत हुआ था, न कि ट्रंप की वजह से।

<strong>ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम हमला</strong>

इस बहस में <strong>22 </strong><strong>अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम</strong> में हुए <strong>आतंकी हमले</strong> का मुद्दा भी शामिल किया गया है, जिसमें <strong>26 </strong><strong>हिंदू श्रद्धालुओं की जान गई थी</strong>। विपक्ष पूछ रहा है कि अब तक हमले के जिम्मेदार आतंकियों को पकड़ा क्यों नहीं गया?
सरकार की तरफ से कहा गया है कि ऑपरेशन सिंदूर इसी के जवाब में चलाया गया, लेकिन अब तक इसके पूरे ब्योरे सामने नहीं आए हैं।

<strong>बिहार में </strong><strong>SIR </strong><strong>यानी </strong><strong>Special Intensive Revision</strong>

चर्चा के दौरान बिहार में चल रही <strong>वोटर लिस्ट की स्पेशल रिवीजन (</strong><strong>SIR)</strong> का मुद्दा भी उठेगा। विपक्ष का आरोप है कि इसमें गड़बड़ियां हो रही हैं, जबकि सरकार कह रही है कि यह नियमित प्रक्रिया है।

<strong>अब आगे क्या</strong><strong>?</strong>
<ul>
 	<li>बहस <strong>28 </strong><strong>जुलाई को लोकसभा</strong> में शुरू होगी और <strong>29 </strong><strong>जुलाई को राज्यसभा</strong> में जारी रहेगी।</li>
 	<li>यह बहस संसद के इतिहास की <strong>सबसे लंबी चर्चाओं में से एक</strong> हो सकती है, जिसमें सुरक्षा, विदेश नीति और राजनीति—तीनों पहलुओं पर बात होगी।</li>
 	<li>इसमें इस बात पर भी चर्चा होगी कि क्या <strong>सरकार जनता और संसद को ऑपरेशन सिंदूर के सभी तथ्यों से अवगत करा रही है या नहीं।</strong></li>
</ul>
<strong>लोगों के लिए क्यों ज़रूरी है जानना</strong><strong>?</strong>
<ul>
 	<li>क्योंकि ये बहस सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि <strong>देश की सुरक्षा</strong>, <strong>हमारे पड़ोसी देशों से रिश्ते</strong>, और <strong>भारत की विदेश नीति</strong> की साख से जुड़ी है।</li>
 	<li>अगर किसी विदेशी नेता ने हमारे देश की ओर से बिना जानकारी के कुछ तय किया, तो यह <strong>संप्रभुता पर सीधा हमला</strong> माना जाएगा।</li>
</ul>
<strong>ऑपरेशन सिंदूर</strong> और <strong>ट्रंप के दावे</strong> ने संसद का तापमान बढ़ा दिया है। अब देखना ये है कि इस बहस में सरकार कितनी पारदर्शिता दिखाती है और विपक्ष इसे किस हद तक मुद्दा बनाता है। संसद में होने वाली ये 25 घंटे की बहस न सिर्फ सांसदों के लिए, बल्कि हर आम नागरिक के लिए भी अहम होगी।]]></content:encoded>
					
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	</item>
		<item>
		<title>Jagdeep Dhankhar ने Health Reasons से Vice President पद से दिया Resign, कहा – &#8220;Bharat के उज्जवल भविष्य पर है पूरा भरोसा&#8221;</title>
		<link>https://trendstopic.in/jagdeep-dhankhar-resigns-as-vice-president-citing-health-reasons-says-i-have-full-faith-in-indias-bright-future/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Jul 2025 04:45:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिल्ली]]></category>
		<category><![CDATA[BharatFuture]]></category>
		<category><![CDATA[BreakingNews]]></category>
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		<category><![CDATA[VicePresidentResigns]]></category>
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					<description><![CDATA[भारत के उपराष्ट्रपति <strong>जगदीप धनखड़</strong> ने सोमवार को अपने पद से <strong>अचानक इस्तीफा</strong> दे दिया। उन्होंने अपने त्यागपत्र में लिखा कि वे अब <strong>स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता</strong> देना चाहते हैं और <strong>डॉक्टरों की सलाह</strong> के अनुसार आगे का इलाज कराना चाहते हैं। उनका इस्तीफा <strong>तुरंत प्रभाव से</strong> लागू हो गया है।

धनखड़ ने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को सौंपते हुए कहा,

“स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता देने और मेडिकल एडवाइस को फॉलो करने के लिए, मैं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 67(क) के तहत तत्काल प्रभाव से उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे रहा हूं।”

<strong>राष्ट्रपति</strong><strong>, </strong><strong>प्रधानमंत्री और सांसदों को जताया आभार</strong>

जगदीप धनखड़ ने अपने <strong>इस्तीफे वाले पत्र</strong> में देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सभी सांसदों के प्रति <strong>गहरी कृतज्ञता</strong> जाहिर की। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को “<strong>अटूट समर्थन और सहयोग</strong>” के लिए धन्यवाद कहा और उनके साथ बिताए गए समय को <strong>"</strong><strong>सुखद कार्यकाल"</strong> बताया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी मंत्रिपरिषद को धन्यवाद देते हुए उन्होंने लिखा:

“प्रधानमंत्री का सहयोग और समर्थन अमूल्य रहा। मैंने अपने कार्यकाल में उनसे बहुत कुछ सीखा।”

धनखड़ ने <strong>सांसदों को भी धन्यवाद</strong> देते हुए कहा कि:

“सांसदों से जो प्यार, सम्मान और विश्वास मिला, वह हमेशा मेरी यादों में रहेगा।”

<strong>भारत की तरक्की को बताया गर्व का विषय</strong>

अपने पत्र में उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें गर्व है कि वे ऐसे समय में उपराष्ट्रपति रहे जब भारत ने <strong>अर्थव्यवस्था</strong><strong>, </strong><strong>टेक्नोलॉजी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर</strong> तेजी से तरक्की की। उन्होंने कहा कि इस <strong>परिवर्तनशील दौर</strong> में उपराष्ट्रपति के रूप में सेवा देना उनके लिए एक <strong>सम्मान</strong> की बात रही।

“भारत की वैश्विक स्तर पर बढ़ती पहचान और उपलब्धियों को देखकर मुझे गर्व है। मुझे भरोसा है कि भारत का भविष्य बेहद उज्ज्वल है।”

<strong>एक नजर उनके कार्यकाल पर:</strong>
<ul>
 	<li>जगदीप धनखड़ <strong>2022 </strong><strong>से उपराष्ट्रपति</strong> थे।</li>
 	<li>इससे पहले वे <strong>2019 </strong><strong>से </strong><strong>2022 </strong><strong>तक पश्चिम बंगाल के राज्यपाल</strong> रह चुके हैं।</li>
 	<li>वे <strong>कानून के जानकार</strong> और एक अनुभवी नेता रहे हैं।</li>
</ul>
<strong>संवैधानिक पहलू</strong>

धनखड़ का इस्तीफा भारतीय संविधान के <strong>अनुच्छेद </strong><strong>67(</strong><strong>क)</strong> के तहत दिया गया है, जिसमें उपराष्ट्रपति <strong>स्वेच्छा से राष्ट्रपति को लिखित में त्यागपत्र</strong> दे सकता है।

जगदीप धनखड़ का इस्तीफा देश के राजनीतिक हलकों में एक <strong>चौंकाने वाली खबर</strong> के रूप में सामने आया है। हालांकि उन्होंने साफ किया है कि यह निर्णय <strong>स्वास्थ्य कारणों</strong> की वजह से लिया गया है और वह आगे भी देश की तरक्की के लिए शुभकामनाएं देते रहेंगे। अब देश को नए उपराष्ट्रपति की नियुक्ति की प्रक्रिया का इंतजार रहेगा।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[भारत के उपराष्ट्रपति <strong>जगदीप धनखड़</strong> ने सोमवार को अपने पद से <strong>अचानक इस्तीफा</strong> दे दिया। उन्होंने अपने त्यागपत्र में लिखा कि वे अब <strong>स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता</strong> देना चाहते हैं और <strong>डॉक्टरों की सलाह</strong> के अनुसार आगे का इलाज कराना चाहते हैं। उनका इस्तीफा <strong>तुरंत प्रभाव से</strong> लागू हो गया है।

धनखड़ ने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को सौंपते हुए कहा,

“स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता देने और मेडिकल एडवाइस को फॉलो करने के लिए, मैं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 67(क) के तहत तत्काल प्रभाव से उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे रहा हूं।”

<strong>राष्ट्रपति</strong><strong>, </strong><strong>प्रधानमंत्री और सांसदों को जताया आभार</strong>

जगदीप धनखड़ ने अपने <strong>इस्तीफे वाले पत्र</strong> में देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सभी सांसदों के प्रति <strong>गहरी कृतज्ञता</strong> जाहिर की। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को “<strong>अटूट समर्थन और सहयोग</strong>” के लिए धन्यवाद कहा और उनके साथ बिताए गए समय को <strong>"</strong><strong>सुखद कार्यकाल"</strong> बताया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी मंत्रिपरिषद को धन्यवाद देते हुए उन्होंने लिखा:

“प्रधानमंत्री का सहयोग और समर्थन अमूल्य रहा। मैंने अपने कार्यकाल में उनसे बहुत कुछ सीखा।”

धनखड़ ने <strong>सांसदों को भी धन्यवाद</strong> देते हुए कहा कि:

“सांसदों से जो प्यार, सम्मान और विश्वास मिला, वह हमेशा मेरी यादों में रहेगा।”

<strong>भारत की तरक्की को बताया गर्व का विषय</strong>

अपने पत्र में उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें गर्व है कि वे ऐसे समय में उपराष्ट्रपति रहे जब भारत ने <strong>अर्थव्यवस्था</strong><strong>, </strong><strong>टेक्नोलॉजी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर</strong> तेजी से तरक्की की। उन्होंने कहा कि इस <strong>परिवर्तनशील दौर</strong> में उपराष्ट्रपति के रूप में सेवा देना उनके लिए एक <strong>सम्मान</strong> की बात रही।

“भारत की वैश्विक स्तर पर बढ़ती पहचान और उपलब्धियों को देखकर मुझे गर्व है। मुझे भरोसा है कि भारत का भविष्य बेहद उज्ज्वल है।”

<strong>एक नजर उनके कार्यकाल पर:</strong>
<ul>
 	<li>जगदीप धनखड़ <strong>2022 </strong><strong>से उपराष्ट्रपति</strong> थे।</li>
 	<li>इससे पहले वे <strong>2019 </strong><strong>से </strong><strong>2022 </strong><strong>तक पश्चिम बंगाल के राज्यपाल</strong> रह चुके हैं।</li>
 	<li>वे <strong>कानून के जानकार</strong> और एक अनुभवी नेता रहे हैं।</li>
</ul>
<strong>संवैधानिक पहलू</strong>

धनखड़ का इस्तीफा भारतीय संविधान के <strong>अनुच्छेद </strong><strong>67(</strong><strong>क)</strong> के तहत दिया गया है, जिसमें उपराष्ट्रपति <strong>स्वेच्छा से राष्ट्रपति को लिखित में त्यागपत्र</strong> दे सकता है।

जगदीप धनखड़ का इस्तीफा देश के राजनीतिक हलकों में एक <strong>चौंकाने वाली खबर</strong> के रूप में सामने आया है। हालांकि उन्होंने साफ किया है कि यह निर्णय <strong>स्वास्थ्य कारणों</strong> की वजह से लिया गया है और वह आगे भी देश की तरक्की के लिए शुभकामनाएं देते रहेंगे। अब देश को नए उपराष्ट्रपति की नियुक्ति की प्रक्रिया का इंतजार रहेगा।]]></content:encoded>
					
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	</item>
		<item>
		<title>RSS का असली Agenda सामने आया? Rahul Gandhi का बड़ा Statement &#8211; ‘Constitution नहीं, इन्हें चाहिए Manusmriti’</title>
		<link>https://trendstopic.in/rsss-real-agenda-exposed-rahul-gandhis-big-statement-they-dont-want-the-constitution-they-want-manusmriti/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Jun 2025 07:02:21 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिल्ली]]></category>
		<category><![CDATA[BJPvsCongress]]></category>
		<category><![CDATA[ConstitutionOfIndia]]></category>
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		<category><![CDATA[SocialJustice]]></category>
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					<description><![CDATA[देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। <strong>RSS (</strong><strong>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ)</strong> के एक बयान को लेकर कांग्रेस नेता <strong>राहुल गांधी</strong> ने बड़ा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया है कि <strong>RSS </strong><strong>और BJP </strong><strong>को संविधान नहीं, </strong><strong>मनुस्मृति चाहिए</strong>। उनका कहना है कि ये लोग गरीबों, दलितों और पिछड़ों से उनके अधिकार छीनकर उन्हें दोबारा गुलाम बनाना चाहते हैं।

दरअसल, <strong>RSS </strong><strong>के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले</strong> ने हाल ही में एक कार्यक्रम में यह बयान दिया कि संविधान की प्रस्तावना (Preamble) में जो <strong>“Socialist” (</strong><strong>समाजवादी)</strong> और <strong>“Secular” (</strong><strong>धर्मनिरपेक्ष)</strong> शब्द हैं, वे <strong>आपातकाल (Emergency) </strong><strong>के समय 1976 </strong><strong>में जोड़े गए थे</strong>, जबकि <strong>B.R. Ambedkar</strong> द्वारा बनाए गए मूल संविधान में ये शब्द नहीं थे। उन्होंने कहा कि इन शब्दों की अब <strong>पुनः समीक्षा (Review)</strong> होनी चाहिए।

<strong>राहुल गांधी ने किया पलटवार</strong>

इस बयान के बाद <strong>राहुल गांधी</strong> ने <strong>X (</strong><strong>पहले ट्विटर)</strong> पर हिंदी में पोस्ट कर जोरदार हमला बोला। उन्होंने लिखा:

"RSS का नकाब फिर उतर गया है। उन्हें संविधान से चिढ़ है क्योंकि वह बराबरी, सेक्युलरिज्म और न्याय की बात करता है।"

राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि:
<ul>
 	<li>RSS और BJP संविधान की जगह <strong>मनुस्मृति लागू करना</strong> चाहते हैं।</li>
 	<li>इनका असली मकसद <strong>दलितों, </strong><strong>पिछड़ों और गरीबों से उनके अधिकार छीनना</strong> है।</li>
 	<li>ये संविधान जैसे शक्तिशाली हथियार को <strong>लोगों से छीनना चाहते हैं।</strong></li>
</ul>
उन्होंने कहा कि:

"RSS को यह सपना देखना बंद करना चाहिए — हम कभी उन्हें इसमें सफल नहीं होने देंगे। हर देशभक्त भारतीय संविधान की रक्षा आखिरी सांस तक करेगा।"

<strong>'</strong><strong>समाजवादी</strong><strong>' </strong><strong>और </strong><strong>'</strong><strong>धर्मनिरपेक्ष</strong><strong>' </strong><strong>शब्दों का इतिहास</strong>

संविधान की प्रस्तावना में <strong>‘</strong><strong>समाजवादी’ </strong><strong>और ‘</strong><strong>धर्मनिरपेक्ष’ </strong><strong>शब्द 1976 </strong><strong>में जोड़े गए थे</strong>, जब देश में <strong>इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल</strong> लगाया गया था। उस दौरान <strong>42</strong><strong>वां संविधान संशोधन</strong> किया गया था।

RSS के मुताबिक ये शब्द मूल संविधान का हिस्सा नहीं थे और इमरजेंसी के दौरान जब <strong>Parliament, Judiciary </strong><strong>और Fundamental Rights </strong><strong>सब कुछ ठप</strong> हो गया था, तब ये शब्द जोड़ दिए गए। इसलिए अब इन पर फिर से विचार होना चाहिए।

<strong>बड़ा सवाल: क्या संविधान की आत्मा बदलने की कोशिश</strong><strong>?</strong>

इस बयान और राहुल गांधी की प्रतिक्रिया ने एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक सवाल खड़ा कर दिया है —
क्या देश में <strong>संविधान की आत्मा को बदलने की कोशिश हो रही है?</strong>
क्या <strong>‘</strong><strong>मनुस्मृति बनाम संविधान’</strong> की बहस अब असली राजनीतिक एजेंडा बन चुकी है?

जहां एक तरफ RSS अपनी विचारधारा के अनुसार संविधान के कुछ हिस्सों की समीक्षा की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इसे <strong>संविधान पर हमला</strong> मान रहा है।
राहुल गांधी ने इस मुद्दे को <strong>आम जनता, </strong><strong>गरीबों और दलितों से जोड़ा है</strong>, जिससे ये बहस सिर्फ कानूनी या वैचारिक नहीं, बल्कि <strong>जनता से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा</strong> बन चुकी है।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। <strong>RSS (</strong><strong>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ)</strong> के एक बयान को लेकर कांग्रेस नेता <strong>राहुल गांधी</strong> ने बड़ा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया है कि <strong>RSS </strong><strong>और BJP </strong><strong>को संविधान नहीं, </strong><strong>मनुस्मृति चाहिए</strong>। उनका कहना है कि ये लोग गरीबों, दलितों और पिछड़ों से उनके अधिकार छीनकर उन्हें दोबारा गुलाम बनाना चाहते हैं।

दरअसल, <strong>RSS </strong><strong>के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले</strong> ने हाल ही में एक कार्यक्रम में यह बयान दिया कि संविधान की प्रस्तावना (Preamble) में जो <strong>“Socialist” (</strong><strong>समाजवादी)</strong> और <strong>“Secular” (</strong><strong>धर्मनिरपेक्ष)</strong> शब्द हैं, वे <strong>आपातकाल (Emergency) </strong><strong>के समय 1976 </strong><strong>में जोड़े गए थे</strong>, जबकि <strong>B.R. Ambedkar</strong> द्वारा बनाए गए मूल संविधान में ये शब्द नहीं थे। उन्होंने कहा कि इन शब्दों की अब <strong>पुनः समीक्षा (Review)</strong> होनी चाहिए।

<strong>राहुल गांधी ने किया पलटवार</strong>

इस बयान के बाद <strong>राहुल गांधी</strong> ने <strong>X (</strong><strong>पहले ट्विटर)</strong> पर हिंदी में पोस्ट कर जोरदार हमला बोला। उन्होंने लिखा:

"RSS का नकाब फिर उतर गया है। उन्हें संविधान से चिढ़ है क्योंकि वह बराबरी, सेक्युलरिज्म और न्याय की बात करता है।"

राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि:
<ul>
 	<li>RSS और BJP संविधान की जगह <strong>मनुस्मृति लागू करना</strong> चाहते हैं।</li>
 	<li>इनका असली मकसद <strong>दलितों, </strong><strong>पिछड़ों और गरीबों से उनके अधिकार छीनना</strong> है।</li>
 	<li>ये संविधान जैसे शक्तिशाली हथियार को <strong>लोगों से छीनना चाहते हैं।</strong></li>
</ul>
उन्होंने कहा कि:

"RSS को यह सपना देखना बंद करना चाहिए — हम कभी उन्हें इसमें सफल नहीं होने देंगे। हर देशभक्त भारतीय संविधान की रक्षा आखिरी सांस तक करेगा।"

<strong>'</strong><strong>समाजवादी</strong><strong>' </strong><strong>और </strong><strong>'</strong><strong>धर्मनिरपेक्ष</strong><strong>' </strong><strong>शब्दों का इतिहास</strong>

संविधान की प्रस्तावना में <strong>‘</strong><strong>समाजवादी’ </strong><strong>और ‘</strong><strong>धर्मनिरपेक्ष’ </strong><strong>शब्द 1976 </strong><strong>में जोड़े गए थे</strong>, जब देश में <strong>इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल</strong> लगाया गया था। उस दौरान <strong>42</strong><strong>वां संविधान संशोधन</strong> किया गया था।

RSS के मुताबिक ये शब्द मूल संविधान का हिस्सा नहीं थे और इमरजेंसी के दौरान जब <strong>Parliament, Judiciary </strong><strong>और Fundamental Rights </strong><strong>सब कुछ ठप</strong> हो गया था, तब ये शब्द जोड़ दिए गए। इसलिए अब इन पर फिर से विचार होना चाहिए।

<strong>बड़ा सवाल: क्या संविधान की आत्मा बदलने की कोशिश</strong><strong>?</strong>

इस बयान और राहुल गांधी की प्रतिक्रिया ने एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक सवाल खड़ा कर दिया है —
क्या देश में <strong>संविधान की आत्मा को बदलने की कोशिश हो रही है?</strong>
क्या <strong>‘</strong><strong>मनुस्मृति बनाम संविधान’</strong> की बहस अब असली राजनीतिक एजेंडा बन चुकी है?

जहां एक तरफ RSS अपनी विचारधारा के अनुसार संविधान के कुछ हिस्सों की समीक्षा की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इसे <strong>संविधान पर हमला</strong> मान रहा है।
राहुल गांधी ने इस मुद्दे को <strong>आम जनता, </strong><strong>गरीबों और दलितों से जोड़ा है</strong>, जिससे ये बहस सिर्फ कानूनी या वैचारिक नहीं, बल्कि <strong>जनता से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा</strong> बन चुकी है।]]></content:encoded>
					
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		<title>&#8216;Constitution Murder Day&#8217; पर बोले PM Modi– &#8220;हम Democracy के Protecter हर Warrior को Salute करते हैं&#8221;</title>
		<link>https://trendstopic.in/on-constitution-murder-day-pm-modi-says-we-salute-every-warrior-who-protected-democracy/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Jun 2025 05:48:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[BharatKiAwaaz]]></category>
		<category><![CDATA[BlackDayInHistory]]></category>
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		<category><![CDATA[TruthOfEmergency]]></category>
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					<description><![CDATA[25 जून 2025 को प्रधानमंत्री <strong>नरेन्द्र मोदी</strong> ने देश में 1975 में लगे <strong>आपातकाल (</strong><strong>Emergency)</strong> की 50वीं बरसी पर इसे <strong>‘संविधान हत्या दिवस’</strong> के रूप में याद किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म <strong>X (पूर्व ट्विटर)</strong> पर कई पोस्ट शेयर करते हुए उस दौर की घटनाओं को याद किया और लोकतंत्र की रक्षा में जुटे लोगों को <strong>श्रद्धांजलि और सम्मान</strong> दिया।

<strong>क्या था </strong><strong>Emergency?</strong>

25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री <strong>इंदिरा गांधी</strong> ने देश में आपातकाल लागू किया था, जो कि <strong>21 महीने</strong> (मार्च 1977 तक) चला। इस दौरान:
<ul>
 	<li><strong>संविधान में निहित मौलिक अधिकारों</strong> को सस्पेंड कर दिया गया,</li>
 	<li><strong>प्रेस की आज़ादी</strong> छीन ली गई,</li>
 	<li>हजारों <strong>राजनीतिक विरोधियों</strong><strong>, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और आम नागरिकों</strong> को बिना किसी मुकदमे के जेल में डाल दिया गया।</li>
</ul>
देशभर में डर का माहौल था और लोकतंत्र पर गहरा संकट था।

<strong>पीएम मोदी का भावुक संदेश</strong>

पीएम मोदी ने लिखा:

<strong>"आज भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक, आपातकाल लागू होने के 50 साल पूरे हो गए हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि कैसे संविधान की मूल आत्मा को कुचल दिया गया था।"</strong>

उन्होंने कहा कि जो लोग आज लोकतंत्र की बात करते हैं, वही कभी लोकतंत्र को खत्म करने वालों में शामिल थे।

<strong>लोकतंत्र बचाने वाले योद्धाओं को नमन</strong>

एक अन्य पोस्ट में पीएम मोदी ने लिखा: <strong>"हम आपातकाल के खिलाफ डटकर खड़े रहे हर व्यक्ति को सलाम करते हैं। वे भारत के हर कोने से थे, अलग-अलग विचारधाराओं से थे, लेकिन एकजुट होकर लोकतंत्र को बचाने के लिए लड़े।"</strong>

उन्होंने बताया कि <strong>जनता के दबाव</strong> के चलते उस समय की कांग्रेस सरकार को लोकतंत्र बहाल करना पड़ा और 1977 के चुनाव में <strong>जनता पार्टी</strong> की ऐतिहासिक जीत हुई।

<strong>पीएम मोदी ने साझा किया अपना अनुभव</strong>

पीएम मोदी ने बताया कि जब आपातकाल लगा था, तब वे <strong>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (</strong><strong>RSS)</strong> के एक युवा प्रचारक थे। उन्होंने इस दौर को अपने लिए <strong>सीखने का अनुभव</strong> बताया।

<strong>"आपातकाल विरोधी आंदोलन से मुझे लोकतंत्र की अहमियत को गहराई से समझने का मौका मिला। मैंने अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े लोगों से बहुत कुछ सीखा।"</strong>

<strong>‘The Emergency Diaries’ नामक किताब का विमोचन</strong>

प्रधानमंत्री मोदी ने <strong>ब्लू क्राफ्ट डिजिटल फाउंडेशन</strong> द्वारा प्रकाशित नई किताब <strong>‘The Emergency Diaries – Years That Forged a Leader’</strong> का ज़िक्र किया। उन्होंने बताया कि इस किताब में आपातकाल के दौरान के अनुभवों और संघर्षों को दस्तावेज़ की तरह प्रस्तुत किया गया है।
<ul>
 	<li>इस किताब की प्रस्तावना <strong>पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा</strong> ने लिखी है।</li>
 	<li>इसका <strong>विमोचन आज केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह</strong> द्वारा किया गया।</li>
</ul>
<strong>लेटेस्ट अपडेट</strong>
<ul>
 	<li><strong>अमित शाह</strong> ने किताब विमोचन कार्यक्रम में कहा कि – <strong>“आपातकाल की सच्चाई को जानना हर युवा भारतीय के लिए जरूरी है, ताकि फिर कभी लोकतंत्र पर आंच न आए।”</strong></li>
 	<li>भाजपा ने इस अवसर पर देशभर में कई जगह <strong>'लोकतंत्र बचाओ मार्च' और सेमिनार्स</strong> का आयोजन किया है।</li>
</ul>
प्रधानमंत्री मोदी का यह संदेश सिर्फ अतीत की याद नहीं, बल्कि <strong>लोकतंत्र की रक्षा के लिए सतर्क रहने का आह्वान</strong> भी है। यह दिन उन लोगों की याद दिलाता है जिन्होंने <strong>बोलने की आज़ादी</strong><strong>, अभिव्यक्ति के हक और संविधान की रक्षा</strong> के लिए संघर्ष किया।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[25 जून 2025 को प्रधानमंत्री <strong>नरेन्द्र मोदी</strong> ने देश में 1975 में लगे <strong>आपातकाल (</strong><strong>Emergency)</strong> की 50वीं बरसी पर इसे <strong>‘संविधान हत्या दिवस’</strong> के रूप में याद किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म <strong>X (पूर्व ट्विटर)</strong> पर कई पोस्ट शेयर करते हुए उस दौर की घटनाओं को याद किया और लोकतंत्र की रक्षा में जुटे लोगों को <strong>श्रद्धांजलि और सम्मान</strong> दिया।

<strong>क्या था </strong><strong>Emergency?</strong>

25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री <strong>इंदिरा गांधी</strong> ने देश में आपातकाल लागू किया था, जो कि <strong>21 महीने</strong> (मार्च 1977 तक) चला। इस दौरान:
<ul>
 	<li><strong>संविधान में निहित मौलिक अधिकारों</strong> को सस्पेंड कर दिया गया,</li>
 	<li><strong>प्रेस की आज़ादी</strong> छीन ली गई,</li>
 	<li>हजारों <strong>राजनीतिक विरोधियों</strong><strong>, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और आम नागरिकों</strong> को बिना किसी मुकदमे के जेल में डाल दिया गया।</li>
</ul>
देशभर में डर का माहौल था और लोकतंत्र पर गहरा संकट था।

<strong>पीएम मोदी का भावुक संदेश</strong>

पीएम मोदी ने लिखा:

<strong>"आज भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक, आपातकाल लागू होने के 50 साल पूरे हो गए हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि कैसे संविधान की मूल आत्मा को कुचल दिया गया था।"</strong>

उन्होंने कहा कि जो लोग आज लोकतंत्र की बात करते हैं, वही कभी लोकतंत्र को खत्म करने वालों में शामिल थे।

<strong>लोकतंत्र बचाने वाले योद्धाओं को नमन</strong>

एक अन्य पोस्ट में पीएम मोदी ने लिखा: <strong>"हम आपातकाल के खिलाफ डटकर खड़े रहे हर व्यक्ति को सलाम करते हैं। वे भारत के हर कोने से थे, अलग-अलग विचारधाराओं से थे, लेकिन एकजुट होकर लोकतंत्र को बचाने के लिए लड़े।"</strong>

उन्होंने बताया कि <strong>जनता के दबाव</strong> के चलते उस समय की कांग्रेस सरकार को लोकतंत्र बहाल करना पड़ा और 1977 के चुनाव में <strong>जनता पार्टी</strong> की ऐतिहासिक जीत हुई।

<strong>पीएम मोदी ने साझा किया अपना अनुभव</strong>

पीएम मोदी ने बताया कि जब आपातकाल लगा था, तब वे <strong>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (</strong><strong>RSS)</strong> के एक युवा प्रचारक थे। उन्होंने इस दौर को अपने लिए <strong>सीखने का अनुभव</strong> बताया।

<strong>"आपातकाल विरोधी आंदोलन से मुझे लोकतंत्र की अहमियत को गहराई से समझने का मौका मिला। मैंने अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े लोगों से बहुत कुछ सीखा।"</strong>

<strong>‘The Emergency Diaries’ नामक किताब का विमोचन</strong>

प्रधानमंत्री मोदी ने <strong>ब्लू क्राफ्ट डिजिटल फाउंडेशन</strong> द्वारा प्रकाशित नई किताब <strong>‘The Emergency Diaries – Years That Forged a Leader’</strong> का ज़िक्र किया। उन्होंने बताया कि इस किताब में आपातकाल के दौरान के अनुभवों और संघर्षों को दस्तावेज़ की तरह प्रस्तुत किया गया है।
<ul>
 	<li>इस किताब की प्रस्तावना <strong>पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा</strong> ने लिखी है।</li>
 	<li>इसका <strong>विमोचन आज केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह</strong> द्वारा किया गया।</li>
</ul>
<strong>लेटेस्ट अपडेट</strong>
<ul>
 	<li><strong>अमित शाह</strong> ने किताब विमोचन कार्यक्रम में कहा कि – <strong>“आपातकाल की सच्चाई को जानना हर युवा भारतीय के लिए जरूरी है, ताकि फिर कभी लोकतंत्र पर आंच न आए।”</strong></li>
 	<li>भाजपा ने इस अवसर पर देशभर में कई जगह <strong>'लोकतंत्र बचाओ मार्च' और सेमिनार्स</strong> का आयोजन किया है।</li>
</ul>
प्रधानमंत्री मोदी का यह संदेश सिर्फ अतीत की याद नहीं, बल्कि <strong>लोकतंत्र की रक्षा के लिए सतर्क रहने का आह्वान</strong> भी है। यह दिन उन लोगों की याद दिलाता है जिन्होंने <strong>बोलने की आज़ादी</strong><strong>, अभिव्यक्ति के हक और संविधान की रक्षा</strong> के लिए संघर्ष किया।]]></content:encoded>
					
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		<title>‘Emergency के 50 साल’ event में बोले Amit Shah – “जो आज democracy की बात करते हैं, वही कभी democracy को निगल गए थे”</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Jun 2025 05:33:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिल्ली]]></category>
		<category><![CDATA[AmitShah]]></category>
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		<category><![CDATA[PoliticalSpeech]]></category>
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					<description><![CDATA[‘आपातकाल के 50 साल’ पूरे होने के मौके पर आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री <strong>अमित शाह</strong> ने कांग्रेस पार्टी और पूर्व प्रधानमंत्री <strong>इंदिरा गांधी</strong> पर जमकर हमला बोला। उन्होंने आपातकाल को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे <strong>काला अध्याय</strong> बताया और कहा कि उस दौर में देश की <strong>जनता की आवाज को कुचल दिया गया था।</strong>

कार्यक्रम में बोलते हुए शाह ने कहा –

“25 जून 1975 की सुबह 8 बजे, इंदिरा गांधी ने <strong>ऑल इंडिया रेडियो</strong> पर देश को बताया कि राष्ट्रपति ने आपातकाल लगा दिया है।
लेकिन क्या संसद से मंजूरी ली गई? क्या कैबिनेट की मीटिंग बुलाई गई? क्या विपक्ष को भरोसे में लिया गया? कुछ भी नहीं किया गया।
सिर्फ सत्ता बचाने के लिए लोकतंत्र का गला घोंटा गया।”

<strong>“</strong><strong>लोकतंत्र को निगल गई थी कांग्रेस</strong><strong>”</strong>

अमित शाह ने तीखे शब्दों में कहा –

“आज जो लोग हर मंच से लोकतंत्र की बात करते हैं, उन्हें पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए।
वे उस पार्टी से जुड़े हैं जिसने लोकतंत्र को ही <strong>खत्म करने का काम किया।</strong>
उस वक्त वजह बताई गई – ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’, लेकिन <strong>असल वजह थी सत्ता की रक्षा</strong>। इंदिरा गांधी ने नैतिकता को त्याग कर प्रधानमंत्री पद पर बने रहने का निर्णय लिया।”

<strong>“</strong><strong>इंदिरा गांधी को नहीं था संसद में वोट देने का अधिकार</strong><strong>”</strong>

शाह ने आगे कहा कि आपातकाल के समय इंदिरा गांधी खुद एक ऐसी स्थिति में थीं जहां वो न तो संसद में वोट डाल सकती थीं और न ही उनके पास कोई नैतिक अधिकार था प्रधानमंत्री बने रहने का।

“फिर भी उन्होंने सत्ता नहीं छोड़ी। ये लोकतंत्र नहीं, <strong>तानाशाही</strong> थी।”

<strong>क्या था </strong><strong>Emergency?</strong>

भारत में <strong>25 </strong><strong>जून </strong><strong>1975 </strong><strong>से </strong><strong>21 </strong><strong>मार्च </strong><strong>1977</strong> तक आपातकाल लागू रहा।
यह कदम तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर राष्ट्रपति <strong>फखरुद्दीन अली अहमद</strong> ने उठाया था।
इस दौरान:
<ul>
 	<li>मीडिया पर <strong>सेंसरशिप</strong> लगाई गई,</li>
 	<li>हजारों <strong>विपक्षी नेताओं को जेल</strong> में डाला गया,</li>
 	<li>नागरिकों के <strong>मौलिक अधिकारों को निलंबित</strong> कर दिया गया।</li>
</ul>
इस समय को आज भी लोग भारत के <strong>लोकतंत्र पर हमले</strong> के रूप में याद करते हैं।

<strong>अमित शाह की अपील</strong>

कार्यक्रम के अंत में गृह मंत्री ने युवाओं से खासतौर पर अपील की कि वे देश के इतिहास को जानें और लोकतंत्र की रक्षा के लिए हमेशा <strong>सजग और सतर्क</strong> रहें।

“आपातकाल सिर्फ एक तारीख नहीं, एक चेतावनी है – कि अगर लोकतंत्र को कमजोर किया गया, तो देश को उसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।”

अमित शाह का यह भाषण न सिर्फ कांग्रेस की आलोचना थी, बल्कि यह लोकतंत्र की <strong>मूल्यवत्ता और रक्षा</strong> की अहमियत को दोहराने का एक प्रयास भी था।
‘आपातकाल के 50 साल’ की यह चर्चा आने वाले समय में भारतीय राजनीति और इतिहास की बहसों को एक बार फिर तेज कर सकती है।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[‘आपातकाल के 50 साल’ पूरे होने के मौके पर आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री <strong>अमित शाह</strong> ने कांग्रेस पार्टी और पूर्व प्रधानमंत्री <strong>इंदिरा गांधी</strong> पर जमकर हमला बोला। उन्होंने आपातकाल को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे <strong>काला अध्याय</strong> बताया और कहा कि उस दौर में देश की <strong>जनता की आवाज को कुचल दिया गया था।</strong>

कार्यक्रम में बोलते हुए शाह ने कहा –

“25 जून 1975 की सुबह 8 बजे, इंदिरा गांधी ने <strong>ऑल इंडिया रेडियो</strong> पर देश को बताया कि राष्ट्रपति ने आपातकाल लगा दिया है।
लेकिन क्या संसद से मंजूरी ली गई? क्या कैबिनेट की मीटिंग बुलाई गई? क्या विपक्ष को भरोसे में लिया गया? कुछ भी नहीं किया गया।
सिर्फ सत्ता बचाने के लिए लोकतंत्र का गला घोंटा गया।”

<strong>“</strong><strong>लोकतंत्र को निगल गई थी कांग्रेस</strong><strong>”</strong>

अमित शाह ने तीखे शब्दों में कहा –

“आज जो लोग हर मंच से लोकतंत्र की बात करते हैं, उन्हें पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए।
वे उस पार्टी से जुड़े हैं जिसने लोकतंत्र को ही <strong>खत्म करने का काम किया।</strong>
उस वक्त वजह बताई गई – ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’, लेकिन <strong>असल वजह थी सत्ता की रक्षा</strong>। इंदिरा गांधी ने नैतिकता को त्याग कर प्रधानमंत्री पद पर बने रहने का निर्णय लिया।”

<strong>“</strong><strong>इंदिरा गांधी को नहीं था संसद में वोट देने का अधिकार</strong><strong>”</strong>

शाह ने आगे कहा कि आपातकाल के समय इंदिरा गांधी खुद एक ऐसी स्थिति में थीं जहां वो न तो संसद में वोट डाल सकती थीं और न ही उनके पास कोई नैतिक अधिकार था प्रधानमंत्री बने रहने का।

“फिर भी उन्होंने सत्ता नहीं छोड़ी। ये लोकतंत्र नहीं, <strong>तानाशाही</strong> थी।”

<strong>क्या था </strong><strong>Emergency?</strong>

भारत में <strong>25 </strong><strong>जून </strong><strong>1975 </strong><strong>से </strong><strong>21 </strong><strong>मार्च </strong><strong>1977</strong> तक आपातकाल लागू रहा।
यह कदम तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर राष्ट्रपति <strong>फखरुद्दीन अली अहमद</strong> ने उठाया था।
इस दौरान:
<ul>
 	<li>मीडिया पर <strong>सेंसरशिप</strong> लगाई गई,</li>
 	<li>हजारों <strong>विपक्षी नेताओं को जेल</strong> में डाला गया,</li>
 	<li>नागरिकों के <strong>मौलिक अधिकारों को निलंबित</strong> कर दिया गया।</li>
</ul>
इस समय को आज भी लोग भारत के <strong>लोकतंत्र पर हमले</strong> के रूप में याद करते हैं।

<strong>अमित शाह की अपील</strong>

कार्यक्रम के अंत में गृह मंत्री ने युवाओं से खासतौर पर अपील की कि वे देश के इतिहास को जानें और लोकतंत्र की रक्षा के लिए हमेशा <strong>सजग और सतर्क</strong> रहें।

“आपातकाल सिर्फ एक तारीख नहीं, एक चेतावनी है – कि अगर लोकतंत्र को कमजोर किया गया, तो देश को उसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।”

अमित शाह का यह भाषण न सिर्फ कांग्रेस की आलोचना थी, बल्कि यह लोकतंत्र की <strong>मूल्यवत्ता और रक्षा</strong> की अहमियत को दोहराने का एक प्रयास भी था।
‘आपातकाल के 50 साल’ की यह चर्चा आने वाले समय में भारतीय राजनीति और इतिहास की बहसों को एक बार फिर तेज कर सकती है।]]></content:encoded>
					
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